Wednesday, March 27, 2019

राम प्रसाद बिस्मिल। Ram Prasad Bismil

राम प्रसाद बिस्मिल Ram Prasad Bismil




राम प्रसाद बिस्मिल का प्रारंभिक जीवन परिचय:

राम प्रसाद बिस्मिल जी का जन्म 11 जून 1897 में उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था इसलिए आज इसी दिन को राम प्रसाद बिस्मिल जयंती के नाम से भी मनाया जाता है। राम प्रसाद बिस्मिल के पिता मुरलीधर शाहजहाँपुर नगर पालिका के एक कर्मचारी थे। राम प्रसाद ने अपने पिता से ही हिंदी भाषा सीखी थी और उन्हें उर्दू सीखने के लिए मौलवी के पास भेजा गया था। राम प्रसाद बिस्मिल एक इंग्लिश मीडियम स्कूल में दाखिला लेना चाहते थे, लेकिन उनके पिता इसके लिए राजी नहीं थे और उन्हें पिता की अस्वीकृति के बिना एक इंग्लिश मीडियम स्कूल में दाखिला मिल गया। उनके पूर्वज ब्रिटिश प्रधान राज्य ग्वालियर के निवासी थे। राम प्रसाद बिस्मिल के पिता शाहजहाँपुर की नगर पालिका बोर्ड के एक कर्मचारी थे।

रामप्रसाद के जन्म के समय तक इनका परिवार पूरी तरह से समाज में एक प्रतिष्ठित व सम्पन्न परिवारों में गिना जाने लगा था। इनके पिता ने विवाह के बाद नगर पालिका में 15/-रुपये महीने की नौकरी कर ली और जब वो इस नौकरी से ऊब गये तो इन्होंने वो नौकरी छोड़कर कचहरी में सरकारी स्टॉम्प बेचने का कार्य शुरु कर दिया। इनके पिता मुरलीधर सच्चे दिल के और स्वभाव से ईमानदार थे। इनके सरल स्वभाव के कारण समाज में इनकी प्रतिष्ठा स्वंय ही बढ़ गयी।


रामप्रसाद बिस्मिल जी का स्वाधीनता आंदोलन से जुडना:

वह बहुत ही कम उम्र में उन्होंने आठवीं कक्षा तक अपनी शिक्षा पूरी की और वह  हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य बन गए। क्रांतिकारी संगठनों के माध्यम से राम प्रसाद बिस्मिल ने चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुखदेव, अशफाक उल्ला खान, राजगुरु, गोविंद प्रसाद, प्रेमकिशन खन्ना, भगवती चरण, ठाकुर रोशन सिंह और राय राम नारायण आदि के साथ स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया।राम प्रसाद बिस्मिल द्वारा ऋषि अरबिंदो की योगिक साधना का अनुवाद किया गया था। राम प्रसाद बिस्मिल के ये सभी कार्य ‘सुशील माला’ नामक सीरीज में प्रकाशित हुए। राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा गोरखपुर जेल की कोठरी में लिखी थी। 
1916 में लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन था जिसमें शामिल होने के लिये बाल गंगाधर तिलक आ रहे थे। जब ये सूचना क्रांन्तिकारी विचारधारा के समर्थकों को मिली तो वो सब बहुत उत्साह से भर गये। लेकिन जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि तिलक जी का स्वागत केवल स्टेशन पर ही किया जायेगा तो उन सब के उत्साह पर पानी फिर गया। रामप्रसाद बिस्मिल को जब ये सूचना मिली तो वो भी अन्य प्रशंसकों की तरह लखनऊ स्टेशन पहुँच गये। इन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर परामर्श किया कि जैसे एक राष्ट्र के नेता का स्वागत होना चाहिये उसी तरह से तिलक का भी स्वागत बहुत भव्य तरीके से किया जाना चाहिये। दूसरे दिन लोकमान्य तिलक स्टेशन पर स्पेशल ट्रेन से पहुँचे। उनके आने का समाचार मिलते ही स्टेशन पर उनके प्रशसकों की बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठा हो गयी। ऐसा लग रहा था जैसे पूरा लखनऊ उन्हें एक बार देखने के लिये उमड़ पड़ा हो।

बिस्मिल अज़ीमाबादी के द्वारा 1921 में लिखी उर्दू कविता " सरफरोशी की तमन्ना " को रामप्रसाद बिस्मिल जी ने अंग्रेजी सरकार से स्वाधीनता के नारे से जोड़कर साथियों के अंदर नई ऊर्जा फूक दी थी वह कविता की मुख्य पंती इस प्रकार है:

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है ,
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है ?
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आस्माँ  !
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है ? "

रामप्रसाद बिस्मिल जी के अंतिम दिनों की कहानी:

राम प्रसाद बिस्मिल ने 9 क्रांतिकारियों के साथ हाथ मिलाकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के लिए काम किया और रामप्रसाद बिस्मिल और उसके सहयोगी अशफाक उल्ला खान के गुरुमंत्र का पालन करके उन्होंने काकोरी ट्रेन डकैती के माध्यम से सरकारी खजाने को लूट लिया।
काकोरी कांड में दोषी ठहराए जाने के बाद ब्रिटिश सरकार ने फैसला सुनाया कि मृत्यु के लिए राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी दी जाएगी। उन्हें गोरखपुर में सलाखों के पीछे रखा गया था और तब 19 दिसंबर, 1927 में 30 साल की उम्र में उन्हें फांसी पर लटका दिया गया था।
उनकी मृत्यु ने देश के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के मुख्य क्रांतिकारियों का बल छीन लिया था। उन्हें काकोरी कांड के शहीद के रूप में याद किया जाता है।
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Location: India

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