Wednesday, March 6, 2019

बुल्ले शाह : एक धार्मिक प्रवित्ति के सूफी संत। Bulle Shah: Sufi santa of a commonwealth religious

बुल्ले शाह Bulle Shah:

सय्यद अब्दुल्ला शाह क़ादरी जिन्हें बुल्ले शाह के नाम से भी जाना जाता है एक पंजाबी दार्शनिक एवं संत थे। बुल्ले शाह का मूल नाम अब्दुल्लाशाह था। बुल्ले शाह धार्मिक प्रवत्ति के थे। उन्होंने सूफी धर्म ग्रंथों का भीगहरा अध्ययन किया था। साधना से बुल्ले ने इतनी ताकत हासिल कर लीकि अधपके फलों को पेड़ से बिना छुए गिरा दे। पर बुल्ले को तलाश थी इकऐसे मुरशद की जो उसे खुदा से मिला दे। शायद यही कारण है कि उन्हें आधुनिक इतिहास से दूर रखा गया है।
बुल्ले शाह की कविता "बुल्ला की जाना" को रब्बी शेरगिल ने एक रॉक गानेके तौर पर गाया। इनकी कविता का प्रयोग पाकिस्तानी फ़िल्म "ख़ुदा के लिये" के गाने"बन्दया हो" में किया गया था। इनकी कविता का प्रयोग बॉलीवुड फ़िल्म रॉकस्टार के गाने "कतया करूँ" में किया गया था। फ़िल्म दिल से के गाने "छइयाँ छइयाँ" के बोल इनकी काफ़ी "तेरेइश्कनचाया कर थैया थैया" पर आधारित थे।


बुल्ले शाह का जीवन Life of Bulle Shah:

इनके जीवन में अलग अलग मतभेद है। इनका जन्म 1680 में उच गीलानियो में हुआ। इनके पिता शाह मुहम्मद थे जिन्हें अरबी, फारसी और कुरान शरीफ का अच्छा ज्ञान था। वह आजीविका की खोज में गीलानिया छोड़ कर परिवार सहित कसूर (पाकिस्तान) के एक गाँव में बस गए। उस समय बुल्ले शाह की आयु छे वर्ष की थी, बुल्ले शाह जीवन भर कसूर में ही रहे। पिता के नेक जीवन के कारण उन्हें दरवेश कहकर आदर दिया जाता था। पिता के ऐसे व्यक्तित्व का प्रभाव बुल्ले शाह पर भी पड़ा।
इनके पिता मस्जिद के मौलवी थे, वे सैयद जाति से सम्बन्ध रखते थे। इनकी उच्च शिक्षा कसूर में ही हुई। इनके उस्ताद हजरत गुलाम मुर्तजा सरीखे ख्यातनामा थे। अरबी, फारसी के विद्वान होने के साथ साथ आपने इस्लामी और सूफी धर्म ग्रंथो का भी गहरा अध्ययन किया। उनके पहले आध्यात्मिक गुरु संत सूफी मुर्शिद शाह इनायत अली थे, वे लाहौर से थे। बुल्ले शाह को मुर्शिद से आध्यामिक ज्ञान रूपी खाजने की प्राप्ति हुई और उन्हें उनकी करिश्माई ताकतों के कारण पहचाना जाता था। आगे चलकर इनका नाम बुल्ला शाह या बुल्ले शाह हो गया। प्यार से इन्हें साईं बुल्ले शाह या बुल्ला कहते। 
परमात्मा की दर्शन की तड़प इन्हें फकीर हजरत शाह कादरी के द्वार पर खींच लाई। हजरत इनायत शाह का डेरा लाहौर में था, वे जाति से अराई थे। अराई लोग खेती-बाड़ी, बागबानी और साग-सब्जी की खेती करते थे। बुल्ले शाह के परिवार वाले इस बात से दुखी थे कि बुल्ले शाह ने निम्न जाति के इनायत शाह को अपना गुरु बनाया है। उन्होंने समझाने का बहुत यत्न किया परन्तु बुल्ले शाह जी अपने निर्णय से टस से मस न हुए। 
बुल्ले शाह का असली नाम अब्दुल्ला शाह था। उन्होंने शुरुआतीशिक्षा अपने पिता से ग्रहण की थी और उच्च शिक्षा क़सूर में ख़्वाजा ग़ुलाममुर्तज़ा से ली थी। पंजाबी कवि वारिस शाह ने भी ख़्वाजा ग़ुलाम मुर्तज़ा सेही शिक्षा ली थी उनके सूफ़ी गुरु इनायत शाह थे। बुल्ले शाह की मृत्यु1757 से 1759 के बीच क़सूर में हुई थी। बुल्ले शाह के बहुत से परिवारजनों ने उनका शाह इनायत का चेला बनने का विरोध किया था क्योंकिबुल्ले शाह का परिवार पैग़म्बर मुहम्मद का वंशज होने की वजह से ऊँचीसैय्यद जात का था जबकि शाह इनायत जात से आराइन थे, जिन्हें निचलीजात माना जाता था। लेकिन बुल्ले शाह इस विरोध के बावजूद शाह इनायतसे जुड़े रहे और अपनी एक कविता में उन्होंने कहा:
संस्कृति पर प्रभाव
2007 में इनके देहांत की 250वीं वर्षगाँठ मनाने के लिये क़सूर शहर में एकलाख से अधिक लोग एकत्रित हुए थे।
सैकड़ों वर्ष बीतने के बाद भी बाबा बुल्ले शाह की रचनाएँ अमर बनी हुई हैं।आधुनिक समय के कई कलाकारों ने कई आधुनिक रूपों में भी उनकीरचनाओं को प्रस्तुत किया है।
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Tuesday, March 5, 2019

खुदीराम बोस:सबसे कम उम्र का शहीद क्रांतिकारी। Khudiram Bose: youngest martyr revolutionary.

खुदीराम बोस Khudiram Boss:


खुदीराम बोस आज़ादी के लिए शहीद होने वाले सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी थे जिन्हें 18 वर्ष के उम्र में 11 अगस्त 1908 को फाँसी की सज़ा दे दी गयी थी। आज जिस हिंदुस्तान में हम आज़ादी के साथ रह रहे है उस आज़ादी के लिए अनेको महापुरुषों ने अपने जीवन की आहूति दी है परंतु शायद आज़ादी के बाद के इतिहास कारो ने केवल कुछ ही लोगो की महिमा का बखान किया इसमे उनका स्वार्थ हो सकता है परंतु उन महापुरुषों के बारे में जानने का अधिकार सभी लोगो को और आने वाली पीढ़ियों को है।
खुदीराम बोस के जन्म 18 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर नामक जिले में हुआ था। उनके पिता का नाम त्रिलोकीनाथ बोस तथा माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था।

खुदीराम बोस के क्रांतिकारी बनने की वजह Reason of Khudiram boss becoming revolutionary:

खुदीराम बोस बचपन से ही अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे आंदोलन में हिस्सा लेने लगे थे , उस समय भारत की आज़ादी के कई संघर्ष चल रहे थे। उन आज़ादी के संघर्षों से प्रभावित खुदीराम बोस ने क्रांतिकारी बनने का निर्णय किया जब 1905 में जब अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया तो पूरे देश के इसका विद्रोह हुआ तब खुदीराम बोस ने अत्येन्द्र बोस की अगवानी में क्रांतिकारी बन गए। 9वी की परीक्षा के बाद वो रिवोल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बने और आज़ादी के नारे लगाने लगे और बंदेमातरम के पर्चे बाटने लगे।

खुदीराम बोस के क्रांतिकारी कारनामे Revolutionary activity of Khudiram Boss:

खुदीराम बोस कई बार पुलिस के द्वारा पकड़े गए परंतु कम उम्र के कारण उनको छोड़ दिया जाता था। परंतु जब उनका नाम नायरायनगड रेलवे स्टेशन पर में आया उसके बाद उनको एक बहुत जरूरी काम दिया गया वो था अंग्रेजी ऑफिसर किंग्सफोर्ड को मारने का काम। इस काम के लिए वो बिहार के मुज्जपरपुर जिले में गए उनके साथ प्रफुल चंद्र चाकी भी थे।
एक दिन मौका देखकर उन्होंने किंग्सफोर्ड की बग्घी में बम फेंक दिया। इस घटना में अंग्रेज अधिकारी की पत्नी और बेटी मारी गई लेकिन वह बच गया। घटना के बाद खुदीराम बोस और प्रफुल चंद वहां से 25 मील भागकर एक स्टेशन पर पहुंचे। लेकिन वहीं पुलिस को दोनो पर शक हो गया।
उनको चारो ओर से घेर लिया गया। प्रफुल चंद ने खुद को गोली मार स्टेशन पर शहादत दे दी। थोड़ी देर बाद खुदीराम को भी गिरफ्तार कर लिया गया। उनके खिलाफ 5 दिन तक मुकदमा चल  8 जून, 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया और 13 जून को उन्हें मृत्य दंड की सजा सुनाई गई।  11 अगस्त 1908 को इस क्रांतिकारी को फांसी पर चढ़ा दिया आजादी के संघर्ष में यह किसी क्रांतिकारी को पहली फांसी थी।



तो अपने क्रांतिकारीओं और महापुरुषों के बारे में जानकारी प्राप्त करे औऱ लोगो को शेयर करे। साथ ही अपने सुझाव अवश्य दे।


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Saturday, March 2, 2019

शक वंश का इतिहास। History of Shak Vansh.

शक वंश Shak Vansh:


शक प्राचीन आर्यों के वैदिक कालीन सम्बन्धी रहे हैं जो शाकल द्वीप पर बसने के कारण शाक अथवा शक कहलाये. भारतीय पुराण इतिहास के अनुसार शक्तिशाली राजा सगर द्वारा देश निकाले गए थे। हूणों द्वारा शकों को शाकल द्वीप क्षेत्र से भी खदेड़ दिया गया था। जिसके परिणाम स्वरुप शकों का कई क्षेत्रों में बिखराव हुआ। शक और शाक्य वंश में अंतर है, शाक्य वंश गौतम बुद्ध से जुड़ा है, जो गौतम गोत्र के क्षत्रिय थे, इनका छेत्र नेपाल के पास था। पुराणों में शक वंश की उत्पत्ति सूर्यवंशी राजा नरिष्यंत से कही गई है। राजा सगर ने राजा नरिष्यंत को राज्यच्युत तथा देश से निर्वासित किया था। उन्हीं के वंशज शक कहलाए। माना जाता है कि आजादी के बाद जब इतिहास लिखा गया तो हिन्दू विजयों और प्रतीकों को जानबूझकर हाशिये पर धकेला गया और उन लोगों का महिमामंडन ज्यादा किया गया जिन्होंने भारत पर आक्रमण करके यहां की संस्कृति और सभ्यता को लगभग तहस नहस कर दिया। 
भारत के अंग्रेजों से आज़ादी के पश्चात इन्ही के पंचांग शक संवत को भारतीय राष्ट्रीय कलेंडर बनाया गया है

शक वंश का साम्राज्य:

भारत के उस कठिन समय के शक्तिशाली गण मालवगण के अधिपति विक्रमादित्य ने यौद्धेय गण और बाकी गणों को संघटित कर एक बड़ी सेना खड़ी की। अत्यंत निपुण सेनानी विक्रमादित्य के नेतृत्व में इस संघटित भारतीय सेना की शकों से भीषण लड़ाई हुई और एक के बाद एक युद्ध जीतते हुए विक्रम की सेना आगे बढ़ती गई और उन्होंने शकों को हर जगह से उखाड़ फेंका। शक सत्ता से बेदखल हो गए लेकिन उनके कुछ समूह भारतीय धर्म और संस्कृति में ही घुल मिल कर रहने लगे।  आधुनिक विद्वनों का मत है कि मध्य एशिया पहले शकद्वीप के नाम से प्रसिद्ध था। यूनानी इस देश को 'सीरिया' कहते थे। उसी मध्य एशिया के रहनेवाला शक कहे जाते है। एक समय यह जाति बड़ी प्रतापशालिनी हो गई थी। ईसा से दो सौ वर्ष पहले इसने मथुरा और महाराष्ट्र पर अपना अधिकार कर लिया था। ये लोग अपने को देवपुत्र कहते थे। इन्होंने १९० वर्ष तक भारत पर राज्य किया था। इनमें कनिष्क और हविष्क आदि बड़े बड़े प्रतापशाली राजा हुए हैं।
भारत के पश्चिमोत्तर भाग कापीसा और गांधार में यवनों के कारण ठहर न सके और बोलन घाटी पार कर भारत में प्रविष्ट हुए। तत्पश्चात् उन्होंने पुष्कलावती एवं तक्षशिला पर अधिकार कर लिया और वहाँ से यवन हट गए। 72 ई. पू. शकों का प्रतापी नेता मोअस उत्तर पश्चिमांत के प्रदेशों का शासक था। उसने महाराजाधिराज महाराज की उपाधि धारण की जो उसकी मुद्राओं पर अंकित है। उसी ने अपने अधीन क्षत्रपों की नियुक्ति की जो तक्षशिला, मथुरा, महाराष्ट्र और उज्जैन में शासन करते थे। कालांतर में ये स्वतंत्र हो गए। शक विदेशी समझे जाते थे यद्यपि उन्होंने शैव मत को स्वीकार कर किया था। मालव जन ने विक्रमादित्य के नेतृत्व में मालवा से शकों का राज्य समाप्त कर दिया और इस विजय के स्मारक रूप में विक्रम संवत् का प्रचलन किया जो आज भी हिंदुओं के धार्मिक कार्यों में व्यवहृत है। शकों के अन्य राज्यों का शकारि विक्रमादित्य गुप्तवंश के चंद्रगुप्त द्वितीय ने समाप्त करके एकच्छत्र राज्य स्थापित किया। शकों को भी अन्य विदेशी जातियों की भाँति भारतीय समाज ने आत्मसात् कर लिया। शकों की प्रारंभिक विजयों का स्मारक शक संवत् आज तक प्रचलित है।

शक वंश का विक्रमादित्य के साथ टकराव:

विक्रमादित्य के भारतीय वीरता के इतिहास में एक ऐसा अध्याय है जिसे कभी उद्घाटित नहीं किया ग्या क्योंकि वह हिन्दू अस्मिता और गौरव से जुड़ा हुआ था। जब विक्रमादित्य ने शकों को समूल से हराकर उन्हें देश से बाहर धकेल दिया था जब उन्हें इस विजय के बाद शाकारी उपाधी से सम्मानीत किया गया था। इस विजय की याद में ही महान विक्रमादित्य ने एक संवत शुरू किया था जिसे आज हम विक्रम संवत कहते हैं। दरअसल कहानी कुछ यूं है कि ईसा के 100 वर्ष पहले भारत पर शकों के आक्रमण की शुरुआत हुई। ग्रीक प्रदेश बैक्ट्रिया को जीतने के बाद शकों ने भारत पर आक्रमण कर दिया। संपूर्ण भारत में शक तेजी से तूफान की तरह फैल गए थे और उन्होंने लगभग संपूर्णा भारत पर कब्जा ही कर लिया था। सिंध से लेकर वे दक्षिण के आंध्र तक चले गए थे।
महाजनपदों में विभाजित भारत के अधिकतर हिस्से शकों के अधिन हो गए थे। सिंध, पंजाब, कश्मीर, अफगान, राजस्थान और गुजरात में तो इनकी सत्ता मजबूत हो गई थी। साथ ही उत्तर और मध्य भारत के कुछ हिस्से भी इनके अधीन हो चले थे। ऐसे में इतिहास के पटल पर एक शक्तिशाली राजा का प्रादुर्भाव हुआ, मालवपति गंधर्वसेन पुत्र विक्रमादित्य का।



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Wednesday, February 27, 2019

बप्पा रावल का इतिहास। History of Bappa Rawal.

बप्पा रावल Bappa Rawal:



बप्पा रावल एक ऐसा महान भारतीय हिन्दू शासक जिसे भारतीय इतिहास में वो जगह नही मिली जिसके वो हकदार थे क्योंकि इतिहास को बारीकी से पढ़ने वालों को तो शायद पढाया जाता हो परन्तु हमारी पाठ्यक्रम में स्थान नही दिया जाता।
बप्पा रावल मेवाड़ के गुहिल राजवंश के संस्थापक थे। इन्हें सिसोदिया राजवंश भी कहा जाता है जिसमे आगे चल के महान शासक राणा कुम्भा, राणा सांगा और महाराणा प्रताप जैसे वीर और पराक्रमी हुए। पप्पा इनका मूल नाम नही था अपितु एक आदरसूचक शब्द है जो पिता या महान व्यक्ति के लिए स्तेमाल किया जाता है। इन्ही के नाम पर रावलपिंडी नामक सहर है जो अब के पाकिस्तान में है।

बप्पा रावल का अरब और स्लामिक हमलावर से भिडंत:

जब कासिम सिंध से आगे बढ़ा तो अच्छे-अच्छे राजाओं की हालत खराब हो गयी थी. कासिम लगातार हिन्दू औरतों की इज्जत लूट रहा था. बच्चों का कत्लेआम कर रहा था लेकिन कोई भी हिन्दुतानी राजा इसकी टक्कर नहीं ले पा रहा था. तब यह खबर शिव के भक्त और राजस्थान के हिन्दू शेर योद्धा बप्पारावल तक पहुंची तो बप्पा ने कासिम को ऐसा सबक सिखाया कि . सालों तक भारत में कोई विदेशी आक्रमणकारी भारत की तरफ आँख नहीं उठा पाया।
यह एतिहासिक कहानी उन दिनों की है जब भारत पर बाहरी आक्रमणकारी लोगों ने हमला शुरू कर दिया था. अरब और इरान से कई शासक लगातार हिन्दुस्तान पर हमला कर रहे थे. बाहरी इस्लाम लगातार भारत पर लूट के लिए कब्जा कर रहा था. इसी कड़ी में मोहम्मद बिन कासिम भारत आया था और इतिहास बताता है कि इस युवा योद्धा ने सिंध के राजा दाहिर को बुरी तरह से हराया था.
बप्पा रावल गहलौत राजपूत वंश के आठवें शासक थे और उनका बचपन का नाम राजकुमार कलभोज था. मोहम्मद बिन कासिम के अत्याचार की खबर जब बप्पारावल तक पहुंची तो उन्होंने तुरन्त अपनी सेना को इकट्ठा कर युद्ध की तैयारी शुरू कर दी. बाप्पा ने अजमेर और जैसलमेर जैसे छोटे राज्यों को भी अपने साथ मिला लिया और एक बलशाली शक्ति खड़ी की. मोहम्मद बिन कासिम की टक्कर लेना आसान नहीं था. इसके पास लाखों सैनिकों की सेना थी. कई लाख तो इसकी सेना में धोड़े ही थे. राजा दाहिर के पुत्र जयसिंह ने कासिम से डरकर जान बचाते हुए चित्तोड़ में शरण ली थी. कासिम ने चित्तोड़ पर हमला किया और यहाँ भयंकर युद्ध हुआ.इस युद्ध में मोहम्मद बिन कासिम की हार हुई और वो जान बचाकर सिंध भाग गया .



तो दस्तों अपने महापुरुषों को पढ़े और उनपर चर्चा करें, क्योंकि वही हमारे वास्तविक शासक है। और हमारे पूर्वजों और शासकों के बारे में अपने सुझाव दे और जानकारी शेयर करे।


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Monday, February 25, 2019

गुप्त सामाज्य का इतिहास। History of Gupta Dynasty.

गुप्त साम्राज्य का उदय Rise of Gupta Dynasty:


मौर्या सम्राज्य के पश्चात प्राचीन भारत का प्रमुख हिन्दू साम्राज्य था गुप्त साम्राज्य। इस सामाज्‍य का उदय तीसरी शताब्‍दी के अन्‍त में प्रयाग के निकट कौशाम्‍बी में हुआ था। जिस प्राचीनतम गुप्त राजा के बारे में पता चलता है वो थे श्रीगुप्त। पुराणों में ये कहा गया है कि आरंभिक गुप्त राजाओं का साम्राज्य गंगा द्रोणी, प्रयाग, साकेत (अयोध्या) तथा मगध में फैला हुआ था। बाद में इसका फैलाव अब के पाकिस्तान , पश्चिमी मध्य एवं पूर्वी भारत, नेपाल , बांग्लादेश तक फैला था। बाद में राजा विक्रमादित्य ने अपनी राजधानी उज्जैन में बनाई थी। गुप्त साम्राज्य 320ई से 550ई तक था उनके शासक इस प्रकार थे:
Picture from: FlexiPrep

श्रीगुप्त ShriGupt:

श्रीगुप्त के समय में महाराजा की उपाधि सामन्तों को प्रदान की जाती थी, अतः श्रीगुप्त किसी के अधीन शासक थे। इनके साम्राज्य में हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म के मिला जुला समन्वय था।

घटोत्कच गुप्त Ghatotkach Gupt:

श्रीगुप्त के बाद उसका पुत्र घटोत्कच गद्दी पर बैठा। 280 ई. से 320 ई. तक गुप्त साम्राज्य का शासक बना रहा। इसने भी महाराजा की उपाधि धारण की थी। कही कही इसे पहला गुप्त शासक कहा गया है।

चन्द्रगुप्त प्रथम Chandra Gupt (I):

चंद्रगुप्त प्रथम ऐसे पहले थे जिन्हें महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी। सन् 320 में चन्द्रगुप्त प्रथम अपने पिता घटोत्कच के बाद राजा बना। इसका शासन काल 320 ई. से 335 ई. तक था। चन्द्रगुप्त गुप्त वंशावली में पहला स्वतन्त्र शासक था।  बाद में लिच्छवि को अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया। चन्द्रगुप्त ने लिच्छवि के सहयोग और समर्थन पाने के लिए उनकी राजकुमारी कुमार देवी के साथ विवाह किया। इन्होंंने पाटलिपुत्र को अपनी राजधानी बनाया।

समुद्रगुप्त Samudragupt:

समुद्रगुप्त एक असाधारण सैनिक योग्यता वाला महान विजित सम्राट था। विन्सेट स्मिथ ने इन्हें नेपोलियन की उपाधी दी। समुद्रगुप्त का शासनकाल राजनैतिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से गुप्त साम्राज्य के उत्कर्ष का काल माना जाता है। इस साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी। समुद्रगुप्त ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। समुद्रगुप्त एक अच्छा राजा होने के अतिरिक्त एक अच्छा कवि तथा संगीतज्ञ भी था। उसका सबसे महत्वपूर्ण अभियान दक्षिण की तरफ़ दक्षिणापथ था। इसमें उसके बारह विजयों का उल्लेख मिलता है।

रामगुप्त RamGupt:

समुद्रगुप्त के बाद रामगुप्त सम्राट बना, लेकिन इसके राजा बनने में विभिन्‍न विद्वानों में मतभेद है। कहा जाता है वो बहुत कमजोर और खराब युद्धकौशल का था।

चन्द्रगुप्त द्वितीय या विक्रमादित्य ChandraGupta II or Vikramaditya:

चन्द्रगुप्त ने नाग राजकुमारी कुबेर नागा के साथ विवाह किया जिससे एक कन्या प्रभावती गुप्त पैदा हुई। वाकाटकों का सहयोग पाने के लिए चन्द्रगुप्त ने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक नरेश रूद्रसेन द्वितीय के साथ कर दिया। उसने एसा संभवतः इसलिए किया कि शकों पर आक्रमण करने से पहले दक्कन में उसको समर्थन हासिल हो जाए। उसने प्रभावती गुप्त के सहयोग से गुजरात और काठियावाड़ की विजय प्राप्त की। वाकाटकों और गुप्तों की सम्मिलित शक्‍ति से शकों का उन्मूलन किया। कदम्ब राजवंश का शासन कुंतल (कर्नाटक) में था। चन्द्रगुप्त के पुत्र कुमारगुप्त प्रथम का विवाह कदम्ब वंश में हुआ।
शक उस समय गुजरात तथा मालवा के प्रदेशों पर राज कर रहे थे। शकों पर विजय के बाद उसका साम्राज्य न केवल मजबूत बना बल्कि उसका पश्चिमी समुद्र पत्तनों पर अधिपत्य भी स्थापित हुआ। इस विजय के पश्चात उज्जैन गुप्त साम्राज्य की राजधानी बना। इनके महत्वपूर्ण विजय वाहीक विजय, और बंगाल विजय था।

बाद में कुमारगुप्त तथा स्कन्दगुप्त मुख्य शासक थे। तथा अंत मे इस साम्राज्य का अंत लगभग 550ई में हुई।



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Sunday, February 24, 2019

राजेन्द्र चोल एवं चोल राजवंश के इतिहास। Rajendra Chol and Chol Dynasty

राजेन्द्र चोल प्रथम(I) Rajendra chol (I):

राजेन्द्र चोल (I) चोल राजवंश के बहुत महान, शंघर्षशील एंव शक्तिशाली हिन्दू सम्राट थे, जिन्होंने अपने महान युद्ध कौशल से अपने राज्य की सीमाओं को दक्षिण से पूर्व एवम पश्चिम के सुदूर छेत्र तक पहुचाया। उन्हें गंगई कोंड की उपाधि दी गयी थी। वे दक्षिण भारत के बहुत शक्तिशाली सम्राट बने जिनका कार्यकाल 1012 ई से 1043 ई तक रहा।
राजेन्द्र चोल ने अपने साम्राज्य को पहले दक्षिण छोर से अब के तमिलनाडु से केरल, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल तक फैलाया। उसके बाद उन्होंने कई राजाओं से युद्ध करते हुए शुदुर पूर्वउत्तर छेत्रो तक पहुचाया।
परंतु इतने महान सम्राट जिन्होंने अपने पराक्रम से हिन्दू साम्राज्य को इतना बड़ा, किया फिर भी हमारे इतिहास के पाठ्यक्रम से दूर है जिनका शायद ही किसी पुस्तक में जिक्र हो।

राजेन्द्र चोल का चोल साम्राज्य Chol Dynasty:

राजेन्द्र चोल का चोला साम्राज्य का फैलाव इतना दूर तक फैला था जिसमे अब के कई देश है, जो है: भारत का दक्षिण छेत्र, श्रीलंका, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम, सिंगापुर, थाईलैंड, कंबोडिया, म्यामार, मालदीव।
यह चोल साम्राज्य सन 848ई से 1279ई तक रहा, जो कि हिन्दू साम्राज्य था। यह साम्राज्य विजयालय चोल से सुरु होकर राजेन्द्र चोल III तक रहा। इनका सासन सुनियोजित रूप से कार्य करता था। सभी मंत्रियों से परामर्श लेकर कार्य किया करते थे।

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Saturday, February 23, 2019

भगवान राम का वंश और कुल। Descendants of Lord Shriram.

भगवान राम का कुल एवं वंश:

क्या कारण है कि इतिहास के पाठ्यक्रम में भगवान राम और उनके कुल का वर्णन नही मिलता। मुगल तानाशाहों के कुल के वंसज को तो हमे पढ़ाया गया हुमायूं, बाबर,अकबर ...
परंतु हमे श्रीरामबीके वंश का वर्णन इतिहास से गायब है।  इसलिए बहुत ही कम लोगो को भगवान राम के वंशज का ज्ञान समान्य लोगो को नही है। यहां पर जानकारी उन्ही की देने की कोशिश है।




भगवान विष्णु ने अपना सातवां अवतार श्रीराम के रूप में दसरथ पुत्र के रूप में लिया था। उनका यह कुल उनके पूर्वज रघु के नाम पर रघुकुल कहा जाता था, तथा उनका वंश उनके पूर्वज इक्षवाकु के नाम पर था। भगवान राम का वंश उनके पूर्वज मनु के दूसरे पुत्र इक्ष्वाकु से विकुक्षि, निमि और दण्डक पुत्र उत्पन्न हुए। इस तरह इक्षवाकु से यह वंश परम्परा चलते-चलते हरिश्चन्द्र रोहित, वृष, बाहु और सगर तक पहुँची। इक्ष्वाकु प्राचीन कौशल देश के राजा थे और इनकी राजधानी अयोध्या थी। रामायण के बालकांड में गुरु वशिष्ठजी द्वारा राम के कुल का वर्णन किया गया है:
ब्रह्माजी से मरीचि का जन्म हुआ। मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। कश्यप के विवस्वान और विवस्वान के वैवस्वतमनु हुए। वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था। वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था। इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुल की स्थापना की।
इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए। कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था। विकुक्षि के पुत्र बाण और बाण के पुत्र अनरण्य हुए। अनरण्य से पृथु और पृथु और पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ। त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए। धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था। युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए और मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ। सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित। ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए। 
भरत के पुत्र असित हुए और असित के पुत्र सगर हुए। सगर अयोध्या के बहुत प्रतापी राजा थे, उन्होंने सातों समुंद्र को खुदवाया था , सगर की दो रानिया थी एक से 60 हजार पुत्र थे जिनको कपिल मुनि ने भस्म कर दिया था। जिनके मोक्ष के लिए गंगा के अवतरण का उपाय करना था।
सगर के दूसरी पत्नी का पुत्र का नाम असमंज था। असमंज के पुत्र अंशुमान तथा अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए। दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए। भगीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतार था। और अपने पूर्वजों को मोक्ष दिलवाया था। भगीरथ के पुत्र ककुत्स्थ और ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए। रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया। तब राम के कुल को रघुकुल भी कहा जाता है।

रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए। प्रवृद्ध के पुत्र शंखण और शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए। सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था। अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग और शीघ्रग के पुत्र मरु हुए। मरु के पुत्र प्रशुश्रुक और प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए। अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था। नहुष के पुत्र ययाति और ययाति के पुत्र नाभाग हुए। नाभाग के पुत्र का नाम अज था। अज के पुत्र दशरथ हुए और दशरथ के ये चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हैं।
लव और कुश, भगवान राम और माता सीता के जुड़वां बच्चे थे। कुश, लव से बड़े थे। नगरवासियों की बातों को सुनकर राम ने सीता को राज्य से निकाल दिया था। तब माता सीता ने महर्षि वाल्मीकि की कुटिया में अपने सुपुत्रों को जन्म दिया था।
महर्षि वाल्मीकि ने ही लव और कुश को सभी शिक्षा दी थी। फिर जब ये कुछ बड़े हुए तो राम ने महल में अश्वमेध यज्ञ करवाया था। इसी यज्ञ के दौरान राम को ज्ञात हुआ कि लव और कुश उन्हीं के पुत्र हैं। लव-कुश के बाद कुश के पुत्र अतिथि राजा बने। मुनि वशिष्ठ के सानिध्य में अतिथि एक कुशल राजा बने। वो बड़े दिल वाले और महान योद्धा थे। अतिथि के बाद उनके पुत्र निषध राजा बने। पुण्डरीक के बाद उनके बेटे क्षेमधन्वा इस वंश के राजा बने। क्षेमधन्वा के बेटे देवताओं की सेना के लीडर थे, इसलिए उनका नाम देवानीक पड़ाराजा देवानीक के बेटे अहीनगु उनके बाद राजा बने। उन्होंने पूरी धरती पर राज किया था। वो इतने अच्छे राजा थे कि उनके दुश्मन भी उन्हें पसंद करते थे। राजा अहीनागु के बाद उनके पुत्र पारियात्र और उनके बाद उनके बेटे आदि राजा बने। रघुवंश के वंशज तो आज भी मौजूद हैं मगर अयोध्या के आखिरी नरेश राजा सुमित्रा माने जाते हैं। 
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