Friday, February 22, 2019

ललितादित्य मुक्तापीड। Lalitaditya muktapid.

ललितादित्य मुक्तापीड Lalitaditya Muktapid:


ललितादित्य का शासन काल 724 से 761ईस्वी तक रहा वे कश्मीर के कर्कोटा वंस के हिन्दू सम्राट थे। जिनका इतिहास भारत के बाहर के देशों में पढ़ाया जाता है परंतु भारत मे बहुत कम लोग ही जानते होंगे। कई देशों के इतिहास में इन्हें भारत का सिकंदर alaxander कहा जाता है। रणबांकुरों की भूमि कई सदियों तक विदेशी आक्रमणकारियों से संघर्ष किया। इस भूमि पर जहां अध्यात्म के ऊंचे शिखरों का निर्माण हुआ, वहीं इसके पुत्रों ने वीरभोग्या वसुंधरा जैसे क्षात्रभाव को अपने जीवन का आवश्यक अंग भी बनाया। संस्कृत के अनेक प्राचीन ग्रंथों में कश्मीर के इस वैभव के दर्शन किए जा सकते हैं।
साहस और पराक्रम की प्रतिमूर्ति सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड का नाम कश्मीर के इतिहास में सर्वोच्च स्थान पर है। उनके काल में कश्मीर का विस्तार मध्य एशिया और बंगाल तक पहुंच गया। उन्होने अरब के मुसलमान आक्रान्ताओं को सफलतापूर्वक दबाया। उन्होने राजा यशोवर्मन को भी हराया जो हर्ष का एक उत्तराधिकारी था तथा तिब्बती सेनाओं को भी पीछे धकेला। उनका राज्‍य पूर्व में बंगाल तक, दक्षिण में कोंकण तक पश्चिम में तुर्किस्‍तान और उत्‍तर-पूर्व में तिब्‍बत तक फैला था। ललितादित्य ने पीकिंग को भी जीता और 12 वर्ष के पश्चात् कश्मीर लौटा। उन्होने अनेक भव्‍य भवनों का निर्माण किया । उसका सैंतीस वर्ष का राज्य उसके सफल सैनिक अभियानों, उसके अद्भुत कला-कौशल-प्रेम और विश्व विजेता बनने की उसकी चाह से पहचाना जाता है। लगातार बिना थके युद्धों में व्यस्त रहना और रणक्षेत्र में अपने अनूठे सैन्य कौशल से विजय प्राप्त करना उसके स्वभाव का साक्षात्कार है। 
कर्कोटा वंस ने कई सदियों तक भारत की अरब सेनायों से संघर्ष किया था जिसका उदाहरण है कि चंद्रापीड़ शासनकाल में सातवी सताब्दी के सुरुआत में अरबों का नेता महम्मद बिन कासिम ने आक्रमण किया था जिससे लड़ने के लिए चीनी नरेश के पास दूत भेजकर अरब आक्रमण के विरुद्ध सहायता माँगी थी। अरबों का नेता महम्मद बिन कासिम इस समय तक कश्मीर पहुँच चुका था। यद्यपि चीन से सहायता नहीं प्राप्त हो सकी तथापि चंद्रापीड़ ने कश्मीर को अरबों से आक्रांत होने से बचा लिया। उसके बाद लगभग 500 सालों तक अरब आक्रमण को कर्कोट वंशजो ने रोक परंतु यह इतिहास हमारे पाठ्यक्रम से गायब है।
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Thursday, February 21, 2019

दारा शूकोह का इतिहास History of Dara Shukoh in hindi.

दारा शूकोह Dara Shukoh:

मुगल प्रिंस दारा शूकोह

दारा शूकोह मुगल बादशाह साहजहां और मुमताज़ महल का बड़ा(जेष्ठ) पुत्र था, जिसे साहजहां ने अपने जीतेजी ही अपना उत्तराधिकारी बनाया था परंतु उसके विचारों से भाईओं और मुस्लिम विचारकों में मतभेद था। बाल्यकाल से ही दारा शूकोह का अध्यात्म के प्रति लगाव था। इसलिए कुछ कट्टर मुसलमान उसे धर्मद्रोही मानते थे, तथापि दारा ने इस्लाम की मुख्य भूमि को नहीं छोड़ा। उसे धर्मद्रोही करार दिए जाने का मुख्य कारण उसकी सर्व-धर्म-सम्मिश्रण की प्रवृत्ति थी, जिससे इस्लाम की स्थिति के क्षीण होने का भय था। दारा शूकोह का जन्म 1615 में मृत्यु 1959 दिल्ली में औरंगजेब के द्वारा हुई। 

दारा शूकोह का व्यक्तित्व:


इतिहासकार बर्नीयर ने लिखा है कि दारा में अच्छे गुणों की कमी नहीं थी। वह मितभाषी , हाजिर जबाबी, नम्र और अतयन्त उदार व्यक्ति था। वह अपने को बहुत बुद्धिमान और समझदार समझता था। लोग उससे डरते थे। उसे सही सलाह देने से डरते थे। उसके और भाई पसन्द नहीं करते थे।दारा शूकोह बौद्धिक दृष्टि से अपने परदादा अकबर के गुणों व आदर्शों का अनुयायी था। वह इसी से पे्ररित होकर तालमद , बाइबिल, हिन्दू बेदान्त आदि दर्शनों का उसने अध्ययन कर रखा था। जिन धार्मिक तथ्यों में मतभिन्नता थी उनमें समन्वय करके वह बीच का रास्ता निकालना अपना मुख्य उद्देश्य बना रखा था। वह हिन्दू योगी लालदास तथा मुस्लिम फकीर सरमद का समान रूप से शिष्य था। वह दोनों के सदविचारों को ग्रहण किया था।  वह अपना क्रोध जल्द ही जल्द शान्त कर लेता था। 1653 में उसकी कांधार में पराजय हुई फिर भी शाहजहां उसे अपने उत्तराधिकारी के रूप में देखता था। 

दारा शूकोह का धार्मिक व दार्शनिक विचारक:

वह सभी धर्मों का सम्मान करता था। हिन्दू व ईसाई धर्म में भी रूचि थी। इससे नाराज होकर मुस्लिम कट्टरपंथियों ने उस पर इस्लाम के प्रति अनास्था फैलाने का आरोप लगया था। वह सूफी और तौहीद का जिज्ञासु और संत महात्माओं से मिलता रहता था। एसे अनेक चित्र मिले हैं जिसमें दारा हिन्दू सन्यासियों और मुसलमान फकीरों के संगत में रहा है। वह एक कुशल लेखक भी था। उसने ’’सफीनात अल औलिया’’ व ’’सकीनात अल औलिया’’ सूफी संतो पर लिखी है। उसने ’’रिसाला ए हकनुमा’’ और ’’ तारीकात ए हकीकत’’ सूफी की दार्शनिक पुस्तकें लिखी है। उसकी कविता संग्रह ’’अक्सीर ए आजम ’’ में सर्वेश्वरवादी प्रकृति का बोध होता है। धर्म और वैराग्य के लिए उसने ’’ हसनात अल आरिफीन’’ और ’’मुकालम ए बाबालाल ओ दाराशिकोह’’ पुस्तकें लिखी है। वेदान्त और सूफीबाद की तुलना उसके ’’ मजमा अल बहरेन’’ ग्रंथ की रचना की है। उसने 52 उपनिषदों का अनुवाद ’’ सीर ए अकबर’’ ग्रंथ में किया।

दारा शूकोह का सर्वधर्म के प्रति समभाव रखना ही उसके मृत्यु का कारण बना। उसके विचारों से उसके भाईओं का विशेषकर औरंगजेब के मतभेद था। कई इतिहासकार उसे गुणवान और वीर नही बताते क्योंकि वह अपने पिता के साथ रहना चाहता था और जब साहजहां ने विभाजन करके सब को अलग अलग छेत्र दे दिए तब भी वो पिता के साथ रहता था जबकि उसके भाई सीमा और सैन्य शक्ति बढ़ाने में लगे रहते थे। यही कारण है कि जब साहजहां बीमार पड़े तो औरंगजेब ने फायदा उठाया और दारा शूकोह को पराजित किया।


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